Friday, 7 June 2013

क्या भ्रष्टाचार का वर्ग चरित्र होता है ? : सदानन्द शाही

क्या भ्रष्टाचार का वर्ग चरित्र होता है ?


सदानन्द शाही


पिछले दिनों प्रसिद्ध समाजशास्त्री आशीष नन्दी के एक बयान पर काफी हल्ला हंगामा हुआ। उनकी बात राजनीतिक रूप से गलत थी इसलिए उन्हें माफी भी माँगनी पड़ी। लेकिन इस पूरे वाकये ने यह विचार करने के लिए उकसाया कि क्या भ्रष्टाचार का कोर्इ वर्ग चरित्र होता है। समाज वर्गों में बँटा हुआ है। क्लासिकल मार्क्सवादी नजरिये से देखें तो शोषक वर्ग और शोषित वर्ग है। आर्थिक नजरिये से देखें तो उच्चवर्ग, मध्यवर्ग और निम्न वर्ग है। सामाजिक नजरिये से देखने पर वर्ग के निर्माण में वर्ण, जाति और धर्म के मामले भी शामिल हो जाते हैं। तब उच्च वर्ग, निम्न वर्ग के साथ अल्पसंख्यक, दलित, वंचित, उपेक्षित आदि अनेक वर्ग दिखार्इ देते हैं। इन सभी सामाजिक समूहों में पर्याप्त राजनीतिक चेतना का विकास हुआ है। राजनीति सजग होने की वजह से ये सभी समूह राजनीतिक वर्ग हैं। राजनीतिक सजगता इन सभी वर्गों को सामाजिक रूप से सहभागी बनाती है और देशसेवा के लिए प्रेरित करती है। यह सहभागिता सभी तरह के समूहों को देश सेवा का अवसर देती है। देश सेवा के भीतर से ही स्वयंसेवा का वह रास्ता निकलता है जो भ्रष्टाचार के राजमार्ग पर ले जाता है। देश सेवा का सबसे सुगम तरीका सत्ता है। राजनीति सत्ता प्राप्ति का प्रमुख रास्ता है ही नौकरशाही भी खास तरह की सत्ता देती है। सत्ता में सभी वर्गों की भागीदारी हो रही है। कहते हैं कि सत्ता भ्रष्ट बनाती है और पूर्ण सत्ता पूरी तरह भ्रष्ट बनाती है। इसलिए भ्रष्टाचार किसी खास वर्ग जाति या समूह की बपौती नहीं रह गयी है। लोकतांत्रिक समाज में भ्रष्टाचार का भी लोकतन्त्रीकरण हुआ है। जैसे हर आदमी के वोट की कीमत बराबर है चाहे वह जिस पृष्ठभूमि से आया हो, हर आदमी के मौलिक अधिकार बराबर हैं उसी तरह हर आदमी को भ्रष्ट होने का हक भी हासिल है। भ्रष्ट होना भी जन्म सिद्ध अधिकार है बात अवसर मिलने की है। 

हमारे समाज में भ्रष्टाचार जीवन पद्धति की तरह हो गया है। भ्रष्ट होकर ही व्यावहारिक और नीति निपुण हुआ जा सकता है। जब किसी कर्तव्य निष्ठ, र्इमानदार और मूल्यों और आदर्शों वाले युवा अधिकारी को व्यावहारिक बनने की सलाह दी जाती है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वह भ्रष्टाचार के युग धर्म में शामिल हो जाय। पिछले कुछ सालों से देश भ्रष्टाचार को लेकर उद्वेलित है। यह उद्वेलन समय-समय पर छोटे बड़े आन्दोलनों के माध्यम से प्रकट होता रहा है। मजे की बात यह है कि भ्रष्टाचार ब्रह्म की तरह सर्वव्यापी है और विरोधी आन्दोलनों में भी अपने लिए जगह निकाल ही लेता है। 

अभी हाल में अन्ना हजारे और अरविन्द केजरीवाल भ्रष्टाचार विरोध के चैम्पियन बन कर उभरे थे। अन्ना हजारे के आयोजनों में भ्रष्ट तरीके से अनाप-शनाप धन बटोरने वाले लोगों की सक्रियताएँ सन्देह पैदा करने वाली थीं। इसी बीच अरविन्द केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के गुब्बारे में पिन चुभो दिया। अरविन्द केजरीवाल इस मामले में तो बिल्कुल सही हैं कि राजनीतिक परिवर्तन राजनीति के माध्यम से ही हो सकता है। लेकिन वे जिस तरह के परिवर्तन का सपना दिखा रहे हैं वह एक और राजनीतिक दल बना लेने मात्र से संभव नहीं होने वाला है। अरविन्द केजरीवाल यह भी जानते हैं। इसलिए अरविन्द केजरीवाल का कोर्इ छुपा उद्देश्य भले पूरा होता दिखार्इ दे- वे कोर्इ बड़ा परिवर्तन नहीं करने जा रहे हैं। अलबत्ता वे स्वयं एक तरह का नैतिक भ्रष्टाचार कर रहे हैं। 

आम तौर पर आर्थिक भ्रष्टाचार को ही भ्रष्टाचार माना जाता है। वैचारिक भ्रष्टाचार को भ्रष्टाचार माना ही नहीं जाता है। जबकि भ्रष्टाचार पहले विचारों में घटित होता है फिर आकांक्षाओं में उतरता है और फिर नैतिक रूप से भ्रष्ट बना देता है। आर्थिक भ्रष्टाचार से कहीं ज्यादा खतरनाक नैतिक भ्रष्टाचार है। नैतिक भ्रष्टाचार माने विचार और व्यवहार के बीच का फासला। पहले हम नैतिक और वैचारिक रूप से ही भ्रष्ट होते हैं। आर्थिक भ्रष्टाचार उसी की अभिव्यकित या लक्षण मात्र है।

विचारणीय मुद्दा यह भी है कि भ्रष्टाचार की जड़ कहाँ है- औपनिवेशिक सत्ता द्वारा बनायी गयी नौकरशाही में या कि उसे हाकने वाली राजनीतिक सत्ता में। सवाल यह भी होता है कि भ्रष्टाचार नीचे से उपर की ओर गया है या कि उपर से नीचे की ओर आया है। इस सवाल का ठीक-ठीक उत्तर भले ही न मिले लेकिन यह तो तय है कि यह उपर से नीचे तक मौजूद है। 

आजादी के बाद लम्बे समय तक देश की राजनीति पर कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व रहा है । इसलिए यह माना गया कि भ्रष्टाचार की गंगोत्री तो कांग्रेस से ही शुरू होती है। इसलिए विपक्ष के राजनीतिक समूह भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए तोप का मुँह कांग्रेस की ओर करते रहे हैं । धीरे-धीरे कांग्रेस की एकछत्र सत्ता कमजोर हुर्इ और दूसरे राजनीतिक दलों की सत्ता में भागीदारी शुरू हुर्इ। तब पता चला कि कल तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोर्चा खोलने वाले खुद भ्रष्टाचार के दल-दल में धंस गये हैं। इसलिए धीरे-धीरे भ्रष्टाचार का विरोध राजनीतिक दलों के एजेन्डे से बाहर होता गया। राजनीतिक दलों में एक तरह की आम सहमति सी बन गयी है। वे भ्रष्टाचार का विरोध नहीं करते बलिक चुपचाप अपनी बारी का इन्तजार करते हैं। हमारी महान जनता चुनाव जिता कर न केवल हमारे सब पाप धो देती है बलिक अगले पाँच साल भ्रष्टाचार करने की खुली छूट भी दे देती है। 

सभी राजनीतिक दलों के अपने-अपने सामाजिक आधार हैं। अपने सामाजिक आधार के वृहत्तर हित में भ्रष्टाचार करना धर्म है। इसलिए जिसे हम भ्रष्टाचार समझते है वह वास्तव में राजनीतिक दलों का अपने सामाजिक आधारों के वृहत्तर हित में किया जाने वाला धर्म पालन मात्र है । कर्इ बार हम आश्चर्य चकित होते हैं कि कैसे कोर्इ इस कदर भ्रष्ट व्यवहार कर सकता है और भ्रष्टाचार के उजागर होने पर भी बिना लजिजत हुए जी सकता है। लेकिन वे हमेशा सही होते हैं। उनके पीछे एक बड़ा समूह होता है जो जय जयकार करता रहता है। मामला भ्रष्टाचार का नहीं भ्रष्टाचार में हिस्सेदारी का है। हमारे वर्ग , समाज या समूह का आदमी भ्रष्टाचार नहीं कर रहा है, वह तो सिर्फ हिस्सा बंटा रहा है। अगर समाजवाद है तो फिर भ्रष्टाचार में समाजवाद क्यों नहीं । यही बात नौकरशाही पर भी लागू होती है।

राजनीतिक दलों की तरह नौकरशाही भी किन्हीं सामाजिक आधारों से आती है। बहुधा- नौकरशाही का हिस्सा बनने के मूल में ही भ्रष्ट तन्त्र में शामिल होने की आकांक्षा होती है। इसलिए वहाँ पहुँच कर रच बस जाने में बहुत समय नहीं लगता। नौकरशाही में जो सामा जिक वर्ग पहले से ही काबिज हैं वे तो इस कला में दक्ष है । इधर नौकरशाही के सामाजिक आधार का विस्तार हुआ है । जाहिर है नये रंगरूट लूट की कला में उस तरह दक्ष नहीं हैं, इसीलिए नौसिखिये साइकिल चालक की तरह डममग करते हुए चलते हैं और दिख जाते हैं। आकांक्षा सब की एक होती है। ट्रेनिंग भी एक जैसी होती है। मामला बस दक्षता हासिल करने का है। इसलिए किसी एक वर्ग या समूह को भ्रष्ट कहना या बताना उतना ही गलत है जितना किसी दूसरे वर्ग या सामाजिक समूह को पूरी तरह पाक साफ बताना।

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