Friday, 7 June 2013

मानकीकरण के जंजाल से हिंदी को कब मिलेगी मुक्ति? : उदय प्रकाश

मानकीकरण के जंजाल से हिंदी को कब मिलेगी मुक्ति?

Posted: 06 Jun 2013 02:04 AM PDT

♦ उदय प्रकाश


कई बार, बल्कि लागातार मैं कहता-लिखता रहा हूं कि ‘हिंदी’ कोई एक मानकीकृत, सर्वानुमोदित और सर्वस्वीकृत, लोकानुमोदित भाषा नहीं है। यह एक ‘हिंदी’ नहीं, बहुल हिंदियां है। उत्तर-भारत के कुछ परिचित केंद्रों -बनारस, इलाहाबाद या फिर इन्हीं जाने-माने केंद्रों के वर्चस्व से संचालित दिल्ली और राज्यों की अन्य राजधानियों के संस्थानों से प्रचारित ‘हिंदी’ आधिकारिक भले हो, वह भले ही ‘राजभाषा’ या कार्पोरेट भाषा का दर्जा हासिल कर ले, लेकिन ‘हिंदी’ की क्षेत्रीय-जनपदीय या उप-राष्ट्रीय बहुलताओं को किसी बुलडोजर के जरिये सपाट और एकात्मक नहीं बना सकती। समूचा ‘जनतंत्र’ इसके सामने एक बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा है। ‘लोकतंत्र’ एकात्मक, मानकीकृत, राजभाषा ‘हिंदी’ के सामने एक अलंघ्य बाधा है।

‘हिंदी’ का कौन-सा शब्द ‘शुद्ध’ है, व्युत्पत्ति-वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित है, यह एक ऐसी उलझी हुई गांठ है, जैसे आज कोई पूछे कि कौन सी कार या ट्रैक्टर, कौन-सा बोइंग विमान, कौन-सी बकरी या घोड़ा जैविक-तकनीकी दृष्टि से ‘विशुद्ध’ या ‘प्योर’ है। जैविक प्राणियों की तरह ही, भाषा के लोक में भी इतने सारे विविध सूत्र या कारक हैं, जो ‘हिंदी’ या ‘अंग्रेजी’ जैसी बहु-व्यवहृत भाषा की लोकतांत्रिक बहुलता को सिद्ध करती हैं। एक बार ‘एकोनोमिक टाइम्स’ के भाषा-विवाद में दो-तीन साल पहले भी मैंने विनम्रता के साथ अर्ज किया था कि जिस ‘हिंदी’ भाषा को हमारे समाज की जातीय और राजनीतिक व्यवस्था पुष्ट कर रही है, वह भले ही बाजार (मार्केट), सरकार (गवर्नमेंट) और संचार (मीडिया) की प्रभुत्वशाली भाषा बनायी जा रही हो, उसका ग्रासरूट उसी तरह से कमजोर बल्कि गैरहाजिर है, जैसे कभी संस्कृत या फारसी का था। इसका अर्थ यह न लिया जाय कि एलीट-सत्ता की भाषा में उत्कृष्ट रचनाएं संभव नहीं होतीं। बिल्कुल होती हैं। संस्कृत में सौंदर्य-शास्त्र और काव्य-नाट्य की महान कालजयी रचनाएं हमारे साहित्य-चिंतन की श्रेष्ठ परंपरा का हिस्सा हैं, लेकिन इससे यह नहीं मान लेना चाहिए इससे इतर भाषिक अभिव्यक्तियों में कुछ भी उत्कृष्ट लिखा ही नहीं गया। बल्कि सच इसके ठीक विपरीत है। जीवंत साहित्य बहुतायत में जीवित भाषा में ही लिखा-रचा गया।

एक चुटकुला मुझे, इस संदर्भ में याद आता है। जिस इलाके का मैं हूं और मेरी ‘हिंदी’ है, उसी इलाके के किसी कस्बे के एक मिडिल स्कूल में बनारस-इलाहाबाद की सवर्ण राजभाषा ‘हिंदी’ का एक विद्वान स्कूल प्रिंसपल बन कर आया। स्कूल के बाकी सारे कर्मचारी और अध्यापक विंध्य-छत्तीसगढ़ के ‘हिंदी’ भाषी थे। एक दिन क्या हुआ कि स्कूल के एक ‘हिंदी’ अध्यापक की छुट्टी की अर्जी प्रिंसपल साहेब की मेज तक पहुंची। उस अर्जी में लेखा हुआ था –

मान्यवर पूजनीय प्रिंसपल महोदय,
सविनय नम्र निवेदन है कि मेरा घींच कई दिन से बहुत पिरा रहा है इसलिए कृपा करके मुझे चार दिवस की छुट्टी दे कर अनुग्रहीत करें।
विनीत
राधेलाल तमेर,
साहित्य शिरोमणि

प्रिंसपल ने अर्जी देखी। लिपि तो निस्संदेह ‘देव-नागरी’ थी, कुछ शब्द तत्सम भी थे, लेकिन कुछ ठीक से समझ नहीं आ रहा था। इसलिए उन्होंने स्कूल के एक दूसरे ‘हिंदी’ अध्यापक को बुलाया और पूछा ये ‘घींच’ क्या होता है? कौन-सा अंग?

स्कूल अध्यापक ने आश्चर्य से कहा – ‘सर जी, आप ‘घींच’ नहीं जानते? अरे, सर घींच माने ‘घोंघा’!’

‘घोंघा’? – यूपी के प्रिंसपल साहेब फिर चौंके – ‘घोंघा’? आपका आशय क्या है, बंधु?’

‘सर… सर…! ‘घोंघा’ माने ‘नटई’!

‘नटई’? – प्रिंसपल

‘नटई’ का अर्थ हुआ ”घुटकी”!

‘घुटकी’? – प्रिंसपल।

‘ओह … सरजी, आप ‘हिंदी’ नहीं जानते? ‘घुटकी’ मतलब ‘गटई’ …!

खैर, बनारस-इलाहाबाद के ‘हिंदी’ आचार्य को सिर्फ ‘गर्दन’ और ‘गले’ तक पहुंचने के लिए 13 से अधिक ‘हिंदी’ शब्दों की सुरंग से गुजरना पड़ा।

यह चुटकुला इसीलिए महज एक चुटकुला नहीं रह जाता बल्कि ‘हिंदी’ के मानकीकरण के विराट संगठित, सांस्थानिक उद्यमों के सामने उसके विपुल शब्द भंडार को नेस्तनाबूद करने वाली एक बड़ी जातीय-पूंजीजीवी सत्ता-प्रणाली का उपनिवेश बनने के विरुद्ध किसी बहुजन-प्रतिरोध के रूप में खड़ी होती है।

अभी पिछले साल दो-चार महीने मैं उसी क्षेत्र के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर काम कर रहा था। मेरी चिंताओं में एक चिंता यह भी थी कि उस क्षेत्र में बोली-समझी जाने वाली बहुत बड़ी लेकिन हाशिये में धकेल दी गयीं भाषाऒं को संरक्षित करने या उनमें शिक्षा देने का काम किया जा सकता है… और वहां के ‘हिंदी विभाग’ में क्या वह पाठ्यक्रम और वहां की हिंदी के विद्वान प्राध्यापक नियुक्त हैं?

लेकिन सच यह था कि वह हिंदी विभाग भी वही था, जो मेरे चर्चित, लगभग समस्त भारतीय भाषाओं मे अनुदित और अब अमेरिका के प्रतिष्ठित येल विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित – ‘पीली छतरी वाली लड़की’ के केंद्र में है।

यानी, उस विंध्य-छत्तीसगढ़ी ‘हिंदी’ को उच्च-साहित्यिक शिक्षा से वंचित करने के सरकारी-राजनीतिक खेल में 80 प्रतिशत प्राध्यापक बनारस-इलाहाबाद से ही नियुक्त हैं। … और वहां भी वही संकीर्तन हो रहा है, जो बाकी जगहों पर है।

यह कैसे बदलेगा? और ‘हिंदी’ इस जंजाल से मुक्त कैसे होगी?

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